Sunday, 11 December 2011

Proud to Be JAIN....

JainismJains form less than one percent of the Indian population. For centuries, Jains are famous as community of traders and merchants. The states of Gujarat and Rajasthan have the highest concentration of Jain population in India. The Jain religion is traced to Vardhamana Mahavira (The Great Hero 599-527 B.C.). Mahavira was the twenty-fourth and last of the Jain Tirthankars. Mahavira was born in a ruling family of Vaishali, located in the modern state of Bihar, India. At the age of thirty, Mahavira renounced royal life and devoted himself to the task of discovering the meaning of existence. At the age of 42 he attained enlightenment and spent the rest of his life meditating and preaching Jainism.

Jainism rests on a real understanding of the working of karma, its effects on the living soul and the conditions for extinguishing action and the soul's release. Jainism considers the soul as a living substance that combines with various kinds of non-living matters. The Jain religion rests on complete inactivity and absolute nonviolence (ahimsa) against all living beings. It is evident from the Jain monks and nuns wearing face masks to avoid inhaling small organisms. It is for the same reason all practicing Jains try to remain vegetarians.

The Jain community evolved into two main divisions- the Digambara or "sky-clad" monks do not wear clothes and the Svetambara or "white-clad" monks and nuns, who wear white clothes and carry bowls for collecting food. For centuries Western and southern India have been Jain strongholds. In the mid-1990s, there were about 7 million Jains, the majority of whom live in the states of Maharashtra (mostly in Bombay), Rajasthan, and Gujarat. Karnataka, conventionally a stronghold of Digambaras, also has a considerable Jain community.

Though the Jain shrines include images of the Tirthankars, yet they are not worshiped but remembered and revered. Daily rituals of the Jains may include meditation, bathing the images, offering food, flowers and light lamps for the images. It is interesting to note that the Jains also worship local gods and participate in Hindu or Muslim celebrations without compromising their fundamental path. The Jains celebrate the five major events in the life of Mahavira- conception, birth, renunciation, enlightenment, and final release after death.

Major Jain pilgrimage destinations in India are Palitana, Ranakpur, Shravanbelagola, Dilwara Temple, Khandagiri Caves and Udayagiri Caves

Universal Forgiveness Prayer

खामेमी सव्वे जीव, सव्वे जीव खमंतु में |
Khamemi Savve Jiva, Savve Jiva Khamantu Me |
I grant forgiveness to all living beings. May all living beings grant me forgiveness.

मत्ती में सव्वे भुयेसू, वेरं माझं न केने |
Metti Me Savve Bhuyesu, Veram Majham Na Kenai |
My friendship is with all living beings. My enmity is totally nonexistent.

नवकार मंत्र ही महामंत्र

नवकार मंत्र ही महामंत्र, निज पद का ज्ञान कराता है।
निज जपो शुद्ध मन बच तन से, मनवांछित फल का दाता है॥1॥ नवकार…

पहला पद श्री अरिहंताणां, यह आतम ज्योति जगाता है।
यह समोसरण की रचना की भव्यों को याद दिलाता है॥2॥ नवकार…

दूजा पद श्री सिद्धाणं है, यह आतम शक्ति बढ़ाता है।
इससे मन होता है निर्मल, अनुभव का ज्ञान कराता है॥3॥ नवकार…

तीजा पद श्री आयरियाणां, दीक्षा में भाव जगाता है।
दुःख से छुटकारा शीघ्र मिले, जिनमत का ज्ञान बढ़ाता है॥4॥ नवकार…

चौथा पद श्री उवज्ज्ञायणं, यह जैन धर्म चमकता है।
कर्मास्त्रव को ढीला करता, यह सम्यक्‌ ज्ञान कराता है॥5॥ नवकार…

पंचमपद श्री सव्वसाहूणं, यह जैन तत्व सिखलाता है।
दिलवाता है ऊँचा पद, संकट से शीघ्र बचाता है॥6॥ नवकार…

तुम जपो भविक जन महामंत्र, अनुपम वैराग्य बढ़ाता है।
नित श्रद्धामन से जपने से, मन को अतिशांत बनाता है॥7॥ नवकार…

संपूर्ण रोग को शीघ्र हरे, जो मंत्र रुचि से ध्याता है।
जो भव्य सीख नित ग्रहण करे, वो जामन मरण मिटाता है॥8॥ नवकार…

तीर्थंकर वंदना – कभी वीर बन के

कभी वीर बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना ॥टेक॥
तुम ऋषभ रूप में आना, तुम अजित रूप में आना।
संभवनाथ बन के, अभिनंदन बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम सुमति रूप में आना, तुम पद्‍म रूप में आना।
सुपार्श्वनाथ बन के, चंदा प्रभु बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम पुष्पदंत रूप में आना, तुम शीतल रूप में आना।
श्रेयांसनाथ बन के, वासुपूज्य बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम विमल रूप में आना, तुम अनंत रूप में आना।
धरमनाथ बन के, शांतिनाथ बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम कुंथु रूप में आना, तुम अरह रूप में आना।
मल्लिनाथ बन के, मुनि सुव्रत बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम नमि रूप में आना, तुम नेमि रूप में आना।
पार्श्वनाथ बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
कभी वीर बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥

आरती – बाजे छम-छम-छम छम बाजे घुँघरू

बाजे छम-छम-छम छम बाजे घुँघरू
बाजे घुँघरू…
हाथों में दीपक लेकर आरती करूँ
बाजे छम-छम…
प्रभु को उठाया हाथी पे बैठाया …(२)
पांडुक बन अभिषेक कराया…इसलिए प्रभु तेरी आरती करूँ
दीपक ज्योति से आरती करूँ …(२)
वीर प्रभुजी की मूरत निहारूँ …(२)
ध्यान लगन चरणों में धरूँ
चरणों में धरूँ… हाथों में दीपक लेकर
हम सब प्रभु के गुण को गाएँ
प्रभुजी के चरणों में शीश झुकाएँ… इसलिए प्रभु तेरी आरती करूँ
प्रभु तुम बिन मोहे कोई ना संभाले
प्रभु तुम बिन कोई ना पारे लगावे
मेरी यही चाह और कुछ ना कहूँ… हाथों में दीपक लेकर आरती करूँ

पार्श्वनाथ स्तवन – तुम से लागी लगन

तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा,
मेटो मेटो जी संकट हमारा।

निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेह तजूँ, जीवन सारा,
तेरे चाणों में बीत हमारा ॥टेक॥

अश्वसेन के राजदुलारे, वामा देवी के सुत प्राण प्यारे।
सबसे नेह तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा ॥मेटो॥

इंद्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए।
आशा पूरो सदा, दुःख नहीं पावे कदा, सेवक थारा ॥मेटो॥

जग के दुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है।
मेटो जामन मरण, होवे ऐसा यतन, पारस प्यारा ॥मेटो॥

लाखों बार तुम्हें शीश नवाऊँ, जग के नाथ तुम्हें कैसे पाऊँ ।
पंकज व्याकुल भया दर्शन बिन ये जिया लागे खारा ॥मेटो॥

Wednesday, 9 November 2011

श्री जिनवाणी


केवल रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अंतर
उस श्री जिनवाणी में होता, तत्त्वों का सुंदरतम दर्शन
सद्दर्शन बोध चरण पथ पर, अविरल जो बड़ते हैं मुनि गण
उन देव परम आगम गुरु को , शत शत वंदन शत शत वंदन
इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यामयी कंचन काया
यह सब कुछ जड़ की क्रीडा है , मैं अब तक जान नहीं पाया
मैं भूल स्वयं के वैभव को , पर ममता में अटकाया हूँ
अब निर्मल सम्यक नीर लिए , मिथ्या मल धोने आया हूँ
जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु, अपने अपने में होती है
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृत्ति है
प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित, होकर संसार बड़ाया है
संतप्त हृदय प्रभु चंदन सम, शीतलता पाने आया है
उज्ज्वल हूँ कंठ धवल हूँ प्रभु, पर से न लगा हूँ किंचित भी
फिर भी अनुकूल लगें उन पर, करता अभिमान निरंतर ही
जड़ पर झुक झुक जाता चेतन, की मार्दव की खंडित काया
निज शाश्वत अक्षत निधि पाने, अब दास चरण रज में आया
यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन में माया कुछ शेष नही
निज अंतर का प्रभु भेद काहूँ, औस में ऋजुता का लेश नही
चिन्तन कुछ फिर संभाषण कुछ, वृत्ति कुछ की कुछ होती है
स्थिरता निज में प्रभु पाऊं जो, अंतर का कालुश धोती है
अब तक अगणित जड़ द्रव्यों से, प्रभु भूख न मेरी शांत हुई
तृष्णा की खाई खूब भारी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही
युग युग से इच्छा सागर में, प्रभु ! गोते खाता आया हूँ
चरणों में व्यंजन अर्पित कर, अनुपम रस पीने आया हूँ
मेरे चैत्यन्य सदन में प्रभु! चिर व्याप्त भयंकर अँधियारा
श्रुत दीप बूझा है करुनानिधि, बीती नही कष्टों की कारा
अतएव प्रभो! यह ज्ञान प्रतीक, समर्पित करने आया हूँ
तेरी अंतर लौ से निज अंतर, दीप जलाने आया हूँ।
जड़ कर्म घुमाता है मुझको, यह मिथ्या भ्रांति रही मेरी
में रागी द्वेषी हो लेता, जब परिणति होती है जड़ की
यों भाव करम या भाव मरण, सदिओं से करता आया हूँ
निज अनुपम गंध अनल से प्रभु, पर गंध जलाने आया हूँ
जग में जिसको निज कहता में, वह छोड मुझे चल देता है
में आकुल व्याकुल हो लेता, व्याकुल का फल व्याकुलता है
में शांत निराकुल चेतन हूँ, है मुक्तिरमा सहचर मेरी
यह मोह तड़क कर टूट पड़े, प्रभु सार्थक फल पूजा तेरी
क्षण भर निज रस को पी चेतन, मिथ्यमल को धो देता है
कशायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है
अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल रवि जगमग करता है
दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह है अर्हन्त अवस्था है
यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊंगा
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाउंगा