Sunday, 11 December 2011

Proud to Be JAIN....

JainismJains form less than one percent of the Indian population. For centuries, Jains are famous as community of traders and merchants. The states of Gujarat and Rajasthan have the highest concentration of Jain population in India. The Jain religion is traced to Vardhamana Mahavira (The Great Hero 599-527 B.C.). Mahavira was the twenty-fourth and last of the Jain Tirthankars. Mahavira was born in a ruling family of Vaishali, located in the modern state of Bihar, India. At the age of thirty, Mahavira renounced royal life and devoted himself to the task of discovering the meaning of existence. At the age of 42 he attained enlightenment and spent the rest of his life meditating and preaching Jainism.

Jainism rests on a real understanding of the working of karma, its effects on the living soul and the conditions for extinguishing action and the soul's release. Jainism considers the soul as a living substance that combines with various kinds of non-living matters. The Jain religion rests on complete inactivity and absolute nonviolence (ahimsa) against all living beings. It is evident from the Jain monks and nuns wearing face masks to avoid inhaling small organisms. It is for the same reason all practicing Jains try to remain vegetarians.

The Jain community evolved into two main divisions- the Digambara or "sky-clad" monks do not wear clothes and the Svetambara or "white-clad" monks and nuns, who wear white clothes and carry bowls for collecting food. For centuries Western and southern India have been Jain strongholds. In the mid-1990s, there were about 7 million Jains, the majority of whom live in the states of Maharashtra (mostly in Bombay), Rajasthan, and Gujarat. Karnataka, conventionally a stronghold of Digambaras, also has a considerable Jain community.

Though the Jain shrines include images of the Tirthankars, yet they are not worshiped but remembered and revered. Daily rituals of the Jains may include meditation, bathing the images, offering food, flowers and light lamps for the images. It is interesting to note that the Jains also worship local gods and participate in Hindu or Muslim celebrations without compromising their fundamental path. The Jains celebrate the five major events in the life of Mahavira- conception, birth, renunciation, enlightenment, and final release after death.

Major Jain pilgrimage destinations in India are Palitana, Ranakpur, Shravanbelagola, Dilwara Temple, Khandagiri Caves and Udayagiri Caves

Universal Forgiveness Prayer

खामेमी सव्वे जीव, सव्वे जीव खमंतु में |
Khamemi Savve Jiva, Savve Jiva Khamantu Me |
I grant forgiveness to all living beings. May all living beings grant me forgiveness.

मत्ती में सव्वे भुयेसू, वेरं माझं न केने |
Metti Me Savve Bhuyesu, Veram Majham Na Kenai |
My friendship is with all living beings. My enmity is totally nonexistent.

नवकार मंत्र ही महामंत्र

नवकार मंत्र ही महामंत्र, निज पद का ज्ञान कराता है।
निज जपो शुद्ध मन बच तन से, मनवांछित फल का दाता है॥1॥ नवकार…

पहला पद श्री अरिहंताणां, यह आतम ज्योति जगाता है।
यह समोसरण की रचना की भव्यों को याद दिलाता है॥2॥ नवकार…

दूजा पद श्री सिद्धाणं है, यह आतम शक्ति बढ़ाता है।
इससे मन होता है निर्मल, अनुभव का ज्ञान कराता है॥3॥ नवकार…

तीजा पद श्री आयरियाणां, दीक्षा में भाव जगाता है।
दुःख से छुटकारा शीघ्र मिले, जिनमत का ज्ञान बढ़ाता है॥4॥ नवकार…

चौथा पद श्री उवज्ज्ञायणं, यह जैन धर्म चमकता है।
कर्मास्त्रव को ढीला करता, यह सम्यक्‌ ज्ञान कराता है॥5॥ नवकार…

पंचमपद श्री सव्वसाहूणं, यह जैन तत्व सिखलाता है।
दिलवाता है ऊँचा पद, संकट से शीघ्र बचाता है॥6॥ नवकार…

तुम जपो भविक जन महामंत्र, अनुपम वैराग्य बढ़ाता है।
नित श्रद्धामन से जपने से, मन को अतिशांत बनाता है॥7॥ नवकार…

संपूर्ण रोग को शीघ्र हरे, जो मंत्र रुचि से ध्याता है।
जो भव्य सीख नित ग्रहण करे, वो जामन मरण मिटाता है॥8॥ नवकार…

तीर्थंकर वंदना – कभी वीर बन के

कभी वीर बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना ॥टेक॥
तुम ऋषभ रूप में आना, तुम अजित रूप में आना।
संभवनाथ बन के, अभिनंदन बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम सुमति रूप में आना, तुम पद्‍म रूप में आना।
सुपार्श्वनाथ बन के, चंदा प्रभु बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम पुष्पदंत रूप में आना, तुम शीतल रूप में आना।
श्रेयांसनाथ बन के, वासुपूज्य बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम विमल रूप में आना, तुम अनंत रूप में आना।
धरमनाथ बन के, शांतिनाथ बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम कुंथु रूप में आना, तुम अरह रूप में आना।
मल्लिनाथ बन के, मुनि सुव्रत बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
तुम नमि रूप में आना, तुम नेमि रूप में आना।
पार्श्वनाथ बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥
कभी वीर बन के, महावीर बन के चले आना, दरश मोहे दे जाना॥

आरती – बाजे छम-छम-छम छम बाजे घुँघरू

बाजे छम-छम-छम छम बाजे घुँघरू
बाजे घुँघरू…
हाथों में दीपक लेकर आरती करूँ
बाजे छम-छम…
प्रभु को उठाया हाथी पे बैठाया …(२)
पांडुक बन अभिषेक कराया…इसलिए प्रभु तेरी आरती करूँ
दीपक ज्योति से आरती करूँ …(२)
वीर प्रभुजी की मूरत निहारूँ …(२)
ध्यान लगन चरणों में धरूँ
चरणों में धरूँ… हाथों में दीपक लेकर
हम सब प्रभु के गुण को गाएँ
प्रभुजी के चरणों में शीश झुकाएँ… इसलिए प्रभु तेरी आरती करूँ
प्रभु तुम बिन मोहे कोई ना संभाले
प्रभु तुम बिन कोई ना पारे लगावे
मेरी यही चाह और कुछ ना कहूँ… हाथों में दीपक लेकर आरती करूँ

पार्श्वनाथ स्तवन – तुम से लागी लगन

तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा,
मेटो मेटो जी संकट हमारा।

निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेह तजूँ, जीवन सारा,
तेरे चाणों में बीत हमारा ॥टेक॥

अश्वसेन के राजदुलारे, वामा देवी के सुत प्राण प्यारे।
सबसे नेह तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा ॥मेटो॥

इंद्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए।
आशा पूरो सदा, दुःख नहीं पावे कदा, सेवक थारा ॥मेटो॥

जग के दुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है।
मेटो जामन मरण, होवे ऐसा यतन, पारस प्यारा ॥मेटो॥

लाखों बार तुम्हें शीश नवाऊँ, जग के नाथ तुम्हें कैसे पाऊँ ।
पंकज व्याकुल भया दर्शन बिन ये जिया लागे खारा ॥मेटो॥

Wednesday, 9 November 2011

श्री जिनवाणी


केवल रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अंतर
उस श्री जिनवाणी में होता, तत्त्वों का सुंदरतम दर्शन
सद्दर्शन बोध चरण पथ पर, अविरल जो बड़ते हैं मुनि गण
उन देव परम आगम गुरु को , शत शत वंदन शत शत वंदन
इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यामयी कंचन काया
यह सब कुछ जड़ की क्रीडा है , मैं अब तक जान नहीं पाया
मैं भूल स्वयं के वैभव को , पर ममता में अटकाया हूँ
अब निर्मल सम्यक नीर लिए , मिथ्या मल धोने आया हूँ
जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु, अपने अपने में होती है
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृत्ति है
प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित, होकर संसार बड़ाया है
संतप्त हृदय प्रभु चंदन सम, शीतलता पाने आया है
उज्ज्वल हूँ कंठ धवल हूँ प्रभु, पर से न लगा हूँ किंचित भी
फिर भी अनुकूल लगें उन पर, करता अभिमान निरंतर ही
जड़ पर झुक झुक जाता चेतन, की मार्दव की खंडित काया
निज शाश्वत अक्षत निधि पाने, अब दास चरण रज में आया
यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन में माया कुछ शेष नही
निज अंतर का प्रभु भेद काहूँ, औस में ऋजुता का लेश नही
चिन्तन कुछ फिर संभाषण कुछ, वृत्ति कुछ की कुछ होती है
स्थिरता निज में प्रभु पाऊं जो, अंतर का कालुश धोती है
अब तक अगणित जड़ द्रव्यों से, प्रभु भूख न मेरी शांत हुई
तृष्णा की खाई खूब भारी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही
युग युग से इच्छा सागर में, प्रभु ! गोते खाता आया हूँ
चरणों में व्यंजन अर्पित कर, अनुपम रस पीने आया हूँ
मेरे चैत्यन्य सदन में प्रभु! चिर व्याप्त भयंकर अँधियारा
श्रुत दीप बूझा है करुनानिधि, बीती नही कष्टों की कारा
अतएव प्रभो! यह ज्ञान प्रतीक, समर्पित करने आया हूँ
तेरी अंतर लौ से निज अंतर, दीप जलाने आया हूँ।
जड़ कर्म घुमाता है मुझको, यह मिथ्या भ्रांति रही मेरी
में रागी द्वेषी हो लेता, जब परिणति होती है जड़ की
यों भाव करम या भाव मरण, सदिओं से करता आया हूँ
निज अनुपम गंध अनल से प्रभु, पर गंध जलाने आया हूँ
जग में जिसको निज कहता में, वह छोड मुझे चल देता है
में आकुल व्याकुल हो लेता, व्याकुल का फल व्याकुलता है
में शांत निराकुल चेतन हूँ, है मुक्तिरमा सहचर मेरी
यह मोह तड़क कर टूट पड़े, प्रभु सार्थक फल पूजा तेरी
क्षण भर निज रस को पी चेतन, मिथ्यमल को धो देता है
कशायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है
अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल रवि जगमग करता है
दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह है अर्हन्त अवस्था है
यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊंगा
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाउंगा

जिनवाणी स्तुति (New)


मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकासवे को,
आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है ।
छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध-विधि भानवे को,
स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ॥

अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को,
काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है ।
जहाँ-तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को,
सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है ॥

हे जिनवाणी भारती, तोहि जपों दिन रैन,
जो तेरी शरणा गहै, सो पावे सुख चैन ।
जा वाणी के ज्ञान तें, सूझे लोकालोक,
सो वाणी मस्तक नवों, सदा देत हों ढोक ॥

भक्तामर स्तोत्र (हिन्दी)


भक्त अमर नत मुकुट सु-मणियों, की सु-प्रभा का जो भासक।
पाप रूप अति सघन तिमिर का, ज्ञान-दिवाकर-सा नाशक॥
भव-जल पतित जनों को जिसने, दिया आदि में अवलंबन।
उनके चरण-कमल को करते, सम्यक बारम्बार नमन ॥१॥

सकल वाङ्मय तत्वबोध से, उद्भव पटुतर धी-धारी।
उसी इंद्र की स्तुति से है, वंदित जग-जन मन-हारी॥
अति आश्चर्य की स्तुति करता, उसी प्रथम जिनस्वामी की।
जगनामी सुखधामी तद्भव, शिवगामी अभिरामी की ॥२॥

स्तुति को तैयार हुआ हूँ, मैं निर्बुद्धि छोड़ि के लाज।
विज्ञजनों से अर्चित है प्रभु! मंदबुद्धि की रखना लाज॥
जल में पड़े चंद्र मंडल को, बालक बिना कौन मतिमान।
सहसा उसे पकड़ने वाली, प्रबलेच्छा करता गतिमान ॥३॥

हे जिन! चंद्रकांत से बढ़कर, तव गुण विपुल अमल अति श्वेत।
कह न सके नर हे गुण के सागर! सुरगुरु के सम बुद्धि समेत॥
मक्र, नक्र चक्रादि जंतु युत, प्रलय पवन से बढ़ा अपार।
कौन भुजाओं से समुद्र के, हो सकता है परले पार ॥४॥

वह मैं हूँ कुछ शक्ति न रखकर, भक्ति प्रेरणा से लाचार।
करता हूँ स्तुति प्रभु तेरी, जिसे न पौर्वापर्य विचार॥
निज शिशु की रक्षार्थ आत्मबल बिना विचारे क्या न मृगी?
जाती है मृगपति के आगे, प्रेम-रंग में हुई रंगी ॥५॥

अल्पुत हूँ श्रृतवानों से, हास्य कराने का ही धाम।
करती है वाचाल मुझे प्रभु, भक्ति आपकी आठों याम॥
करती मधुर गान पिक मधु में, जग जन मन हर अति अभिराम।
उसमें हेतु सरस फल फूलों के, युत हरे-भरे तरु-आम ॥६॥

जिनवर की स्तुति करने से, चिर संचित भविजन के पाप।
पलभर में भग जाते निश्चित, इधर-उधर अपने ही आप॥
सकल लोक में व्याप्त रात्रि का, भ्रमर सरीखा काला ध्वान्त।
प्रातः रवि की उग्र-किरण लख, हो जाता क्षण में प्राणांत ॥७॥

मैं मति-हीन-दीन प्रभु तेरी, शुरू करूँ स्तुति अघ-हान।
प्रभु-प्रभाव ही चित्त हरेगा, संतों का निश्चय से मान॥
जैसे कमल-पत्र पर जल कण, मोती कैसे आभावान।
दिखते हैं फिर छिपते हैं, असली मोती में हैं भगवान ॥८॥

दूर रहे स्रोत आपका, जो कि सर्वथा है निर्दोष।
पुण्य कथा ही किंतु आपकी, हर लेती है कल्मष-कोष॥
प्रभा प्रफुल्लित करती रहती, सर के कमलों को भरपूर।
फेंका करता सूर्य किरण को, आप रहा करता है दूर ॥९॥

त्रिभुवन तिलक जगत्पति हे प्रभु! सद्गुरुओं के हे गुरुवर्य्य।
सद्भक्तों जन को निजसम करते, इसमें नहीं अधिक आश्चर्य।
जन को निजसम करते
नहीं करें तो उन्हें लाभ क्या? उन धनिकों की करनी से ॥१०॥

हे अमिनेष विलोकनीय प्रभु, तुम्हें देखकर परम पवित्र।
तौषित होते कभी नहीं हैं, नयन मानवों के अन्यत्र॥
चंद्र-किरण सम उज्ज्वल निर्मल, क्षीरोदधि का कर जलपान।
कालोदधि का खारा पानी, पीना चाहे कौन पुमान ॥११॥

जिन जितने जैसे अणुओं से, निर्मापित प्रभु तेरी देह।
थे उतने वैसे अणु जग में, शांत-रागमय निःसंदेह॥
हे त्रिभुवन के शिरोभाग के, अद्वितीय आभूषण रूप।
इसीलिए तो आप सरीखा, नहीं दूसरों का है रूप ॥१२॥

कहाँ आपका मुख अतिसुंदर, सुर-नर उरग नेत्र-हारी।
जिसने जीत लिए सब-जग के, जितने थे उपमाधारी॥
कहाँ कलंकी बंक चंद्रमा, रंक समान कीट-सा दीन।
जो पलाशसा फीका पड़ता, दिन में हो करके छवि-छीन ॥१३॥

तब गुण पूर्ण-शशांक का कांतिमय, कला-कलापों से बढ़ के।
तीन लोक में व्याप रहे हैं जो कि स्वच्छता में चढ़ के॥
विचरें चाहें जहाँ कि जिनको, जगन्नाथ का एकाधार।
कौन माई का जाया रखता, उन्हें रोकने का अधिकार ॥१४॥

मद की छकी अमर ललनाएँ, प्रभु के मन में तनिक विकार।
कर न सकीं आश्चर्य कौनसा, रह जाती है मन को मार॥
गिरि गिर जाते प्रलय पवन से तो फिर क्या वह मेरु शिखर।
हिल सकता है रंचमात्र भी, पाकर झंझावत प्रखर ॥१५॥

धूप न बत्ती तैल बिना ही, प्रकट दिखाते तीनों लोक।
गिरि के शिखर उड़ाने वाली, बुझा न सकती मारुत झोक॥
तिस पर सदा प्रकाशित रहते, गिनते नहीं कभी दिन-रात।
ऐसे अनुपम आप दीप हैं, स्वपर-प्रकाशक जग-विख्यात ॥१६॥

अस्त न होता कभी न जिसको, ग्रस पाता है राहु प्रबल।
एक साथ बतलाने वाला, तीन लोक का ज्ञान विमल॥
रुकता कभी न प्रभाव जिसका, बादल की आ करके ओट।
ऐसी गौरव-गरिमा वाले, आप अपूर्व दिवाकर कोट ॥१७॥

मोह महातम दलने वाला, सदा उदित रहने वाला।
राहु न बादल से दबता, पर सदा स्वच्छ रहने वाला॥
विश्व-प्रकाशक मुखसरोज तव, अधिक कांतिमय शांतिस्वरूप।
है अपूर्व जग का शशिमंडल, जगत शिरोमणि शिव का भूप ॥१८॥

नाथ आपका मुख जब करता, अंधकार का सत्यानाश।
तब दिन में रवि और रात्रि में, चंद्र बिंब का विफल प्रयास॥
धान्य-खेत जब धरती तल के, पके हुए हों अति अभिराम।
शोर मचाते जल को लादे, हुए घनों से तब क्या काम? ॥१९॥

जैसा शोभित होता प्रभु का, स्वपर-प्रकाशक उत्तम ज्ञान।
हरिहरादि देवों में वैसा, कभी नहीं हो सकता भान॥
अति ज्योतिर्मय महारतन का, जो महत्व देखा जाता।
क्या वह किरणाकुलित काँच में, अरे कभी लेखा जाता? ॥२०॥

हरिहरादि देवों का ही मैं, मानूँ उत्तम अवलोकन।
क्योंकि उन्हें देखने भर से, तुझसे तोषित होता मन॥
है परंतु क्या तुम्हें देखने से, हे स्वामिन मुझको लाभ।
जन्म-जन्म में भी न लुभा पाते, कोई यह मम अमिताभ ॥२१॥

सौ-सौ नारी सौ-सौ सुत को, जनती रहतीं सौ-सौ ठौर।
तुमसे सुत को जनने वाली, जननी महती क्या है और?॥
तारागण को सर्व दिशाएँ, धरें नहीं कोई खाली।
पूर्व दिशा ही पूर्ण प्रतापी, दिनपति को जनने वाली ॥२२॥

तुम को परम पुरुष मुनि मानें, विमल वर्ण रवि तमहारी।
तुम्हें प्राप्त कर मृत्युंजय के, बन जाते जन अधिकारी॥
तुम्हें छोड़कर अन्य न कोई, शिवपुर पथ बतलाता है।
किंतु विपर्यय मार्ग बताकर, भव-भव में भटकाता है ॥२३॥

तुम्हें आद्य अक्षय अनंत प्रभु, एकानेक तथा योगीश।
ब्रह्मा, ईश्वर या जगदीश्वर, विदित योग मुनिनाथ मुनीश॥
विमल ज्ञानमय या मकरध्वज, जगन्नाथ जगपति जगदीश।
इत्यादिक नामों कर मानें, संत निरंतर विभो निधीश ॥२४॥

ज्ञान पूज्य है, अमर आपका, इसीलिए कहलाते बुद्ध।
भुवनत्रय के सुख संवर्द्धक, अतः तुम्हीं शंकर हो शुद्ध॥
मोक्ष-मार्ग के आद्य प्रवर्तक, अतः विधाता कहें गणेश।
तुम सब अवनी पर पुरुषोत्तम, और कौन होगा अखिलेश ॥२५॥

तीन लोक के दुःख हरण, करने वाले है तुम्हें नमन।
भूमंडल के निर्मल-भूषण, आदि जिनेश्वर तुम्हें नमन॥
हे त्रिभुवन के अखिलेश्वर, हो तुमको बारम्बार नमन।
भव-सागर के शोषक-पोषक, भव्य जनों के तुम्हें नमन ॥२६॥

गुणसमूह एकत्रित होकर, तुझमें यदि पा चुके प्रवेश।
क्या आश्चर्य न मिल पाएँ हों, अन्य आय उन्हें जिनेश॥
देव कहे जाने वालों से, आति होकर गर्वित दोष।
तेरी ओर न झाँक सके वे, स्वप्नमात्र में हे गुण-दोष ॥२७॥

उन्नत तरु अशोक के आति, निर्मल किरणोन्नत वाला।
रूप आपका दिखता सुंदर, तमहर मनहर छवि वाला॥
वितरण किरण निकर तमहारक, दिनकर धन के अधिक समीप।
नीलाचल पर्वत पर होकर, निरांजन करता ले दीप ॥२८॥

मणि-मुक्ता किरणों से चित्रित, अद्भुत शोभित सिंहासन।
कांतिमान्‌ कंचन-सा दिखता, जिस पर तब कमनीय वदन॥
उदयाचल के तुंग शिखर से, मानो सहसरश्मि वाला।
किरण-जाल फैलाकर निकला, हो करने को उजियाला ॥२९॥

ढुरते सुंदर चँवर विमल अति, नवल कुंद के पुष्प समान।
शोभा पाती देह आपकी, रौप्य धवल-सी आभावान॥
कनकाचल के तुंगृंग से, झर-झर झरता है निर्झर।
चंद्र-प्रभा सम उछल रही हो, मानो उसके ही तट पर ॥३०॥

चंद्र-प्रभा सम झल्लरियों से, मणि-मुक्तामय अति कमनीय।
दीप्तिमान्‌ शोभित होते हैं, सिर पर छत्रत्रय भवदीय॥
ऊपर रहकर सूर्य-रश्मि का, रोक रहे हैं प्रखर प्रताप।
मानो अघोषित करते हैं, त्रिभुवन के परमेश्वर आप ॥३१॥

ऊँचे स्वर से करने वाली, सर्वदिशाओं में गुंजन।
करने वाली तीन लोक के, जन-जन का शुभ-सम्मेलन॥
पीट रही है डंका-हो सत्‌ धर्म-राज की जय-जय।
इस प्रकार बज रही गगन में, भेरी तव यश की अक्षय ॥३२॥

कल्पवृक्ष के कुसुम मनोहर, पारिजात एवं मंदार।
गंधोदक की मंद वृष्टि, करते हैं प्रभुदित देव उदार॥
तथा साथ ही नभ से बहती, धीमी-धीमी मंद पवन।
पंक्ति बाँध कर बिखर रहे हों, मानो तेरे दिव्य-वचन ॥३३॥

तीन लोक की सुंदरता यदि, मूर्तिमान बनकर आवे।
तन-भामंडल की छवि लखकर, तब सन्मुख शरमा जावे॥
कोटिसूर्य के प्रताप सम, किंतु नहीं कुछ भी आताप।
जिसके द्वारा चंद्र सुशीतल, होता निष्प्रभ अपने आप ॥३४॥

मोक्ष-स्वर्ग के मोक्ष प्रदर्शक, प्रभुवर तेरे दिव्य-वचन।
करा रहे हैं, ‘सत्यधर्म’ के अमर-तत्व का दिग्दर्शन॥
सुनकर जग के जीव वस्तुतः कर लेते अपना उद्धार।
इस प्रकार में परिवर्तित होते, निज-निज भाषा के अनुसार ॥३५॥

जगमगात नख जिसमें शोभें, जैसे नभ में चंद्रकिरण।
विकसित नूतन सरसीरूह सम, है प्रभु! तेरे विमल चरण॥
रखते जहाँ वहीं रचते हैं, स्वर्ग-कमल सुरदिव्य ललाम।
अभिनंदन के योग्य चरण तव, भक्ति रहे उनमें अभिराम ॥३६॥

धर्म-देशना के विधान में, था जिनवर का जो ऐश्वर्य।
वैसा क्या कुछ अन्य कु देवों, में भी दिखता है सौंदर्य॥
जो छवि घोर-तिमिर के नाशक, रवि में है देखी जाती।
वैसी ही क्या अतुल कांति, नक्षत्रों में लेखी जाती ॥३७॥

लोल कपोलों से झरती है, जहाँ निरंतर मद की धार।
होकर अति मदमत्त कि जिस पर, करते हैं भौंरे गुंजार॥
क्रोधासक्त हुआ, यों हाथी, उद्धत ऐरावत सा काल।
देख भक्त छुटकारा पाते, पाकर तव आय तत्काल ॥३८॥

क्षत-विक्षत कर दिए गजों के, जिसने उन्नत गंडस्थल।
कांतिमान्‌ गज-मुक्ताओं से, पाट दिया हो अवनीतल॥
जिन भक्तों को तेरे चरणों, के गिरि की हो उन्नत ओट।
ऐसा सिंह छलाँगे भर कर, क्या उस पर कर सकता चोट ॥३९॥

प्रलय काल की पवन उठाकर, जिसे बढ़ा देती सब ओर।
फिफें फुलिंगे ऊपर तिरछे, अंगारों का भी होवे जोर॥
भुवनत्रय को निगला चाहे, आती हुई अग्नि भभकार।
प्रभु के नाम-मंत्र जल से वह, बुझ जाती है उस ही बार ॥४०॥

कंठ कोकिला सा अति काला, क्रोधित हो फण किया विशाल।
लाल-लाल लोचन करके यदि, झपटें नाग महा विकराल॥
नाम रूप तव अहि- दमनी का, लिया जिन्होंने हो आय।
पग रखकर निःशंक नाग पर, गमन करें वे नर निर्भय ॥४१॥

जहाँ अश्व की और गजों की, चीत्कार सुन पड़ती घोर।
शूरवीर नृप की सेनाएँ, रव करती हों चारों ओर।
वहाँ अकेला शक्तिहीन नर, जप कर सुंदर तेरा नाम।
सूर्य-तिमिर सम शूर-सैन्य का, कर देता है काम-तमाम ॥४२॥

रण में भालों से वेधित गज, तन से बहता रक्त अपार।
वीर लड़ाकू जहाँ आतुर हैं, रुधिर-नदी करने को पार॥
भक्त तुम्हारा हो निराश तहँ, लख अरिसेना दुर्जयरूप।
तव पादारविंद पा आय, जय पाता उपहार-स्वरूप ॥४३॥

वह समुद्र कि जिसमें होवें, मच्छमगर एवं घड़ियाल
तूफाँ लेकर उठती होवें, भयकारी लहरें उत्ताल॥
भँवर-चक्र में फँसी हुई हो, बीचों बीच अगर जलयान।
छुटकारा पा जाते दुःख से, करने वाले तेरा ध्यान ॥४४॥

असहनीय उत्पन्न हुआ हो, विकट जलोदर पीड़ा भार।
जीने की आशा छोड़ी हो, देख दशा दयनीय अपार॥
ऐसे व्याकुल मानव पाकर, तेरी पद-रज संजीवन।
स्वास्थ्य-लाभ कर बनता उसका, कामदेव सा सुंदर तन ॥४५॥

लोह-श्रंखला से जकड़ी है, नख से शिख तक देह समस्त।
घुटने-जंघे छिले बेड़ियों से अधीर जो हैं अतित्रस्त॥
भगवन ऐसे बंदीजन भी, तेरे नाम-मंत्र की जाप॥
जप कर गत-बंधन हो जाते, क्षण भर में अपने ही आप ॥४६॥

वृषभेश्वर के गुण के स्तवन का, करते निशिदिन जो चिंतन।
भय भी भयाकुलित हो उनसे, भग जाता है हे स्वामिन॥
कुंजर-समर सिंह-शोक-रुज, अहि दानावल कारागर।
इनके अतिभीषण दुःखों का, हो जाता क्षण में संहार ॥४७॥

हे प्रभु! तेरे गुणोद्यान की, क्यारी से चुन दिव्य- ललाम।
गूँथी विविध वर्ण सुमनों की, गुण-माला सुंदर अभिराम॥
श्रद्धा सहित भविकजन जो भी कंठाभरण बनाते हैं।
मानतुंग-सम निश्चित सुंदर, मोक्ष-लक्ष्मी पाते हैं ॥४८॥

Dhala – 1 : (1st Shlok)


जे त्रिभुवन में जीव अनंत,सुख चाहें दुःख तै भय्वंत,

ताते दुखहारी सुख कार,कहे सीख गुरु करुना धार.

शब्दार्थ

१.जे-इस
२.त्रिभुवन-तीनो लोकों में.
३.अनंत-जिसका अंत न हो.
४.तै-से
५.भय्वंत-डरते हैं.
६.ताते-इसलिए
७.दुखहारी-दुःख को हरने वाली
७.सुखकार-सुख को देने वाली
७.सीख-सिक्षा
८.गुरु-निर्ग्रन्थ दिगंबर मुनि,सच्चे गुरु
८.करुना-कल्याणक की भावना.

भावार्थ

इस संसार में अनंतानंत जीव है,अनंत जीव राशी,इसका अंत ही नहीं है,चाहे कितने काल बीत जायें,यह संसार कभी खाली नहीं होगा,इन अनंतानंत जीवों में हर जीव सुख चाहता है,कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता है,चाहे वेह चीटीं हो,निगोदिया जीव हों,या पंचेंद्रिया,सैनी या असैनि पशु हो,मतलब  कोई भी दुःख नहीं चाहता है,क्या हम दुःख चाहते हैं,नहीं न,इसी प्रकार कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता,लेकिन यह जीव पुद्गल में सुख खोजने लगता है,बल्कि असली सुख तोह आत्मा स्वाभाव में है,अन्यथा कहीं भी नहीं है,जब जीव को इस सच्चाई का एहसास होता है,यानी की सम्यक्दर्शन होता,जब हम अपने आत्मा स्वाभाव को जानते हैं,तोह हम अत्यंत हर्ष से भर जाते हैं,इसलिए(ताते) हमें यह बात अनंत दुःख का नाश करने वाली (दुःख हारी) और सुख कारी लगती है,और इस आनंद का अनुभव करवाने के लिए हमें सच्चे गुरु,निर्ग्रन्थ गुरु शिक्षा देते हैं,सीख देते हैं,वेह सीख क्या है हम  उसे अगले दोहे में समझेंगे..

Translation :

There are infinite number of living beings and species in this universe and there is no end to it. No matter how many years may pass by, but this universe will never be empty. All these living beings want happiness. None of them want to be unhappy. Be it one sense living being like an ant or five sense living being like human being, none of them want to be unhappy. But the unfortunate thing is that all these living being look for happiness in worldly pleasures which depends upon the external situations like access of relevant objects and capability of sense organs to avail them. They are completely unaware of the lasting bliss which arises from within and hence is not dependent upon the external factor. It is only when a living being starts finding happiness in himself that he experiences true happiness.  Therefore our Acharya teaches  about the factors that can give us true happiness so that the misery stay far away from us.

Dhala 1 : (Stanza -2)


ताहि सुन भवि मन थिर आन,जो चाहो अपना कल्याण,मोह महामद पियो अनादि,भूल आपको भरमत वादी.

भावार्थ :हे भव्या जीव, यदि तू अपना हित चाहता है तो, गुरु की शिक्षा को मन शांत व स्थिर करके सुन | जिस प्रकार एक शराबी शराब के नशे में धुत होकर यहाँ वहाँ गिरता पड़ता रहता है , उसी प्रकार यह जीव भी अनादि कल से मोह रूपी मदिरा के नशे में फंसकर अपने आत्मा स्वरूप को भूल जाता है और चारों गति में जन्म-मरण करके भटकता रहता है |

Taahi Sunau Bhavi Thir Man Aan,Jan Chaahau Apanon Kalyaan;Moha Mahaamad Piau Anaadi,Bhooli Aapakau Bhararmat Vaadi

Word Meaning: Taahi those lessons Sultan listen, Bhavi -living being capable of attaining salvation- bhavya jiva-Thir Man Aan with utmost concentration, Jo Chaahau if you want to attain, Apanau Kalyaalt prosperity of the self, Moha Mahaantad strong wine of delusion. Piau drinking, Anaadi since time infinite, Shook Aapakau never realizing one’s own self, Bharnzat wandering, Vaadi purposeless.

Translation: O living being, if you want to uplift yourself and want true happiness, then listen to the teachings of Acharyas calmly and patiently. Since eternity, the living being is fascinated which worldly pleasure like money, family, property, luxuries etc. etc. He has always been deeply attached with these pleasures and due to this , just like an alcoholic person who loses his control on his senses and keeps falling here and there after having drunk a lot , a living being also keep wandering in this universe (by taking birth and re-birth)  in four gatis .These pleasures keep him away from understanding the meaning of true happiness, which lies in self-realization, and keep him entangled in the vicious circle of life and death.

Dhala 1 : (Stanza -4)


एक श्वाश में अथदस बार,जन्म्यो मरयो,सहयो दुःख भार
निकसि भूमि जल पावक भयो,पवन प्रत्येक वनस्पति थयो

शब्दार्थ
१.श्वाश -एक सांस में
२.अथदस-१८ बार
३.जन्म्यो-जन्मा
४.मरयो-मरा
५.निकसि-वहां से निकलकर,या उचट कर.
६.भूमि-भूमि कायिक जीव
७.जल-जल्कायिक जीव
८.पावक-अग्नि कायिक जीव
९.भयो-हुआ
१०.पवन-वायु कायिक
११.प्रत्येक वनस्पति-वनस्पति कायिक जीव का एक प्रकार.

भावार्थ  कवि कहते है की निगोद, जो की नर्क से भी बदतर गत है, में इस जीव ने एक श्वास मात्र जीतने समय मे १८ बार जनम मरण करके बहुत भयनकर दुख सहन किये हैं! इन दुखो का बोझ सहतें हुए वह बड़ी कठिनाईयो से निकाला हैं और पृथ्वी, जल, अगनि वायु और प्रतेयक वानस्पतिकायी जीव के रूप मॅ उत्तपन हुआ हैं!

Ek Saans Mein Atth-Das Baar,
Jantnau Marau Bharau Dukhbhaar;
Nikasi Bhootni Jal Paawak Bhayau,
Pawan Pratyek Vanaspati Thayau.

Word Meaning: Ek Saans ;Mein in one pulse, Atth-Das Baar eighteen times, Janntau Marau took birth and died, SharauDukhbhaar suffered the pain, Nikasi come out-from nigod-, Bhoomi earth body, Jal water body, Paawak fire body, Bhayau born, Pawan air body, Pratvek Vanaspati Thayau born as an individual plant body life. 

Translation; In the state of the lowest form of life – NIGOD, the suffering of the soul is even worst than in a hell. Inane breathing, he was born and reborn up to eighteen times. The soul went through the cycle of birth and death eighteen times. When the soul got the opportunity to come out of this, he was born into an earth body, water body, fire body, air body and then as an individual plant body. All these migrations were in one sensed life.

Dhala 1: (Stanza -3)


तास भ्रमण की है बहु कथा,पै कुछ कहूँ कही मुनि यथाकाल अनंत निगोद मंझार,बीत्यो एकेंद्रीय तन धार.

शब्दार्थ
१.तास-उस संसार में.
२.भ्रमण-भटकना.
३.बहु-बहुत सारी.
४.पै-मैं (यानी की कवि)
५.मुनि-निर्ग्रन्थ मुनि
६.कछु-थोडा सा ही
७.यथा-वैसा का वैसा,एक जैसा.
८.निगोद-एक ऐसी साधारण वनस्पति पर्याय जिसमें एक जीव में अनंत जीव विधमान होता है,यानी की एक जीव की गोद में अनंतानत जीव होतें हैं.
९.मंझार- चक्कर में फस के.

भावार्थ: संसार में जन्म-मरण की अनेक कहानियाँ | कवि दौलटराम जी कहते हैं , जिस प्रकार मेरे पूर्व आचार्यों ने अपनी रचनाओं में इन कहानियों का उल्लेख किया है , उसी प्रकार मैं भी अपनी रचना में इस बारे में कहता हूँ , परंतु संक्षिप्त में| इस जीव ने नरक से भी बदतर निगोद में एकिन्द्रिय जीव के शरीर भी धारण किए हैं और अनंतानंत काल बिताए हैं!

Taasu Bhraman Ki Hai Bahu Kathaa,
Pal Kachhu Kahau Kahee Muni Jathaa;
Katz! Anant Nigod Manjhaari,
Beetyau lkindri Tan Dhaar.

Word Meaning: Taasu that living being’s mundane existence, BItranzati Ki of wandering, Hai Bahu Kathaa is very long story, Pai Kaelthu but in brief, Kahau state, Kit/tee Muni Jathaa as narrated by the ascetics, Kaal Anatzt time infinite Nigod Manjhaari in the midst of lowest form of life, Beetyau passed, ‘kind,” “Ian Dhaar with only one sense organism. 

Translation : There are  in numerous accounts of sufferings of life and death in transmigratry circle. Pt. Daulat Ram Ji says, just like learn at acharyas in the past have narrated about this in their writings. i would also like to narrate the same but in a shorter version. The living being has passed an infinite time in the lowest form of life – NIGOD, only one sense organ and has suffered a lot.