Wednesday, 9 November 2011

जैन भजन संग्रह – वॉल्यूम २


तर्ज (बहारो फुल बरसावो-सुरज)
तेरे चरणो मे आये. भगवान आशा लेके आये है ।
सुधर जाये प्रभु जीवन ,ये इच्छा लेके आये है ॥
न आवे भाव हिंसा का वचन हितकर सदा बोले ।
शील संतोष मय जीवन की वांछा लेके आये है ॥तेरे चरणो मे॥1
सभी से प्रेम हो ,हमको नही व्देष द्रुष्टो से ।
भाव दुऽखियो पे हम अपना दया को लेके आये है ॥तेरे चरणो मे ॥2
काम और क्रोध की अग्नि हमारी शांत हो भगवन ।
लोभ ,मद मोह मर्दन की सुचिता लेके आये है ॥तेरे चरणो मे ॥3
रहे नित भाव समताका ,न ममता हो हमे तन से ।
सफल शिवराम हो ,कामना लेके आये है ॥तेरे चरणो मे॥4

जय जिनेन्द्र
आत्म नगरमे ज्ञान की गंगा,
जिससे अम्रुत बरसा ।
सम्यकद्रुष्टी भर भर पीवे,मिथ्याद्रुष्टी प्यासा ॥
सम्यकद्रुष्टी समता जल मे, नित ही गोते खाता है ।
मिथ्याद्रुष्टी राग व्देषकी ,आग मे झुलसा जाता है।
समता जल का सीँचन करके हे सुख शांति पा जाता ॥आत्म नगर मे॥1
पुण्य भावको धर्म मान करके ,संसार बढाता ।
राग बंधकी गुत्थीको वह,कभी न कभी न सुलझा पाता ।
जो शुभ फलमे तन्मय होता,वह भी निगोद मे जाता॥आत्म नगर मे॥2
पर मे अहंकार तु करता ,परका स्वामी बनता ।
इसलिये संसार बढाकर,भवसागरमे रुलता।
एक बार निज आत्मरसका पान करो हे ज्ञाता ॥आत्म नगर मे॥3
मनुष्य भव दुर्लभ है, पाकर आत्म ज्योत जगाले ।
ज्ञान उजाले मे आ करके ,अपनी निधी उठाले ।
तु है शुध्द निरंजन चेतन शिवपुरका वासी है॥आत्म नगर मे ॥

जय जिनेन्द्र
तर्ज (मुझको अपने गले-हमराही)
आये यहा तो कुछ कर जाओ,सुनलो मेरे भाई।
खुद को किसी से कम नही समझो,नरतन का यह सार है ॥आये यहा॥
खुद ही खुदा तु खुद ही जिन है खुद ही क्रुष्ण राम है।
बनजाये तेरी आत्मा ,परमात्माका धाम है ।
नही असंभव कार्य यहा पर,यह तो सुलभ संसार है॥आये यहा तो॥
दीनों से तु प्यार है करले,दीनानाथ ही बनजाये।
ऊंच नीच का भेद छोडदे,समदर्शी तु कहलाये।
कौन धनी यहा कौन गरीब है,तजदे कुविचार है॥आये यहा तो॥
आया अकेला है जग मे और अकेला जायेगा ।
काहे किसी से व्देष करे तु यहा से कुछ पायेगा नही ।
गर चाहे तेरा नाम रहे यहा,धरले सदाचार है॥आया यहा तो कुछ कर जाओ॥

जय जिनेन्द्र
तर्ज (नगरी नगरी व्थारे व्दारे)
छोटी मोटी बहिनों पहरो शीलकी चुनरिया ।
प्यारी प्यारी चुनरियासे रिझेगे सावरिया ॥
शीश फुल टिका हो किलपे बडोके आदर मानका ।
शास्त्र श्रमण साहित्य गीतका ,ऐरिँग होवे कान का।
समता रखना दु;खमे न बरसाना रे बदरिया ॥छोटी मोटी॥1
पतिव्रत पन की बिंदिया सोहे,लज्जा काजल आँखमे।
घर समाज की रीती नितीका,सुदर लागे हो नाक मे ।
पानकी लाली मिठी बोली,बोलो बन कोयलिया॥छोटी मोटी॥2
चतुराईजी चेली पोलका,नेकलेस होवे ज्ञानका ।
अच्छे स्वास्थ का भुजबंद पहिनो,घडी चुडियाँ दानकी।
बुरी नजरसे कभी न देखो ,निचे रखो नजरिया॥छोटी मोटी॥4
सत्य व्रत का लहंगा पहिनो,
ओढनी शुभकर्मकी।
भक्तरंगका माहुर मेहदी,बिछीया अहिंसा धर्म की ।
अच्छी चाल की पग मे पहनो ,झनक झनक पायलिया ॥छोटी मोटी॥4
यह चुनरी सुभद्रा ओढी राजमती सिता सतीने।
ओढी चंदना,ओढी अंजना,कलावती,मैनावतीने।
केवल मुनि यश चम चम चमके,ओढी रे सुंदरीया॥
छोटी मोटी बहिनों पहरी शीलकी चुनरिया,प्यारी प्यारी चुनरियोसे॥5

जय जिनेन्द्र
तर्ज (दो हंसो का जोडा बिछुड गयो रे–गंगा जमुना)
काया से चेतन निकल गयो रे,पडी रही काया
भसम भई रे ॥
या काया को खुब खिलाई,तरह तरह का भोजन खिलाया ।
आखिर तो मल ही उगल रही रे ।
पडी रही काया भसम भई रे॥काया से॥1
या काया को खुब सजाई ,वस्त्र आभुषण से मढाई ।
आखिर तो मिट्टी मे मिल गई रे ।
पडी रही काया भसम भई रे॥काया से॥2
टेबल कुर्ची पलंग बिछाई,नरम गद्दी चादर ओढाई ।
आखिर अर्थी पर धर दई रे।
पडी रही काया भसम भई रे॥काया से॥3
या काया को संग संग साथी ,चेतन का कोई नही साथी ।
हंस अकेलो उड गयो रे।
पडी रही काया भसम भई रे॥काया से ॥4
या काया को सब जग रोता,चेतन की सुधि नही लेता ।
कौन गती मे भटक रहो रे ।
पडी रही काया भसम भई रे॥काया से ॥5
जब तक श्वासा तब तक आशा , निकली श्वासा हो वनवासा ।
श्वास श्वास मे भजन करो रे।
पडी रही काया भसम भई रे ॥काया से चेतन निकल गयो रे ,पडी रही काया भसम भई रे॥6

जय जिनेन्द्र